आज हम पवन सिंह के बारे में बात करने वाले हैं जो नेशनल चैंपियन रहे भारतीय सेवा में भर्ती होने के बावजूद वह एक एथलीट कैसे बने कैसे भारत देश के लिए वह गोल्ड मेडल लाया करते थे क्या मजबूरी थी जिसके कारण उन्हें डकैत वरना पड़ा
- पान सिंह तोमर का जीवन परिचय
नाम- पान सिंह तोमर
गांव : भिडोसा जिला मुरैना मध्य प्रदेश जन्म 1 जनवरी 1932
इनका जन्म जो है बेहद ही गरीब और किस परिवार में हुआ था गांव वालों की माने तो उनका कहना है कि पान सिंह तोमर बचपन से ही बहुत जिद्दी स्वभाव के थे वह खेत में काम किया करते थे तब लोग देखे थे तो उनका काम करने का नजरिया ही कुछ अलग तरीके का था काम के साथ-साथ वह दौड़ में गांव में हमेशा आगे रहते थे जब भारतीय सेवा में भर्ती हुए तब उन्होंने अपनी ताकत का जोहार सेवा में भी दिखाया जैसा कि आपने फिल्म में देखा होगा जब वह बंदूक चलाते थे तब एक उनके अवसर पूछते थे कि तुमको निशानेबाजी इतनी अच्छे से क्यों आती है तब बोले थे कि हमारे चाचा जी के पास बहुत सारे हथियार हैं इनके साथ तुम बचपन से खेले हैं हालांकि दौड़ने में हमेशा आगे रहते थे तो वही सेवा में उन्हें बोला गया कि आप दौड़ प्रतियोगिता में भाग क्यों नहीं लेते एक दौड़ होती है इस्टीपलचेज ( 3000 मीटर बाधा दौड़ ) मैं माहिर हो गए थे
- खेल में उनकी उपलब्धियां
उन्होंने 1950 से 1958 के बीच 7 बार नेशनल गेम्स में गोल्ड मेडल जीता और अपने देश का नाम रोशन किया उसके बाद 1958 में वे राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारक बने जैसा कि मैंने बताया था इस स्टीपलचेज़ बाधा दौड़ के भारत के सबसे तेज़ स्टीपलचेज़ धावक बने और भारतीय सेवा ने उनको "Best Athlete of the Year" के पुरस्कार से भी सम्मानित किया था
- एक खिलाड़ी के डाकू बनने की कहानी
पान सिंह तोमर जब सी से रिटायरमेंट होकर आते हैं फिर असली खेल शुरू होता है उनके जीवन का जब रिटायरमेंट होने के बाद जब वह अपने गांव लौटते हैं तब अपनी खेती बाड़ी में हाथ बटाने लगते हैं आपको बता दे 1977 के आसपास वह गांव में वापस आए उनका एक ही सपना था कि वह खेती बड़ी करके अपने जीवन को सुख और शांतिपूर्ण अपने परिवार के साथ बिताना चाहते थे लेकिन गांव के उनके रिश्तेदार मतलब चाचा बलवंत सिंह ने उनकी जमीन पर कब्जा कर रखा था जैसा की फिल्म में दिखाया गया है कि जब भंवर सिंह जमीन पर कब्जा कर लेता है उनकी फसल काट लेता है तब वह पुलिस प्रशासन की मदद के लिए पान सिंह तोमर जाते हैं ऐसे में प्रशासन भी उनकी कोई मदद नहीं करता है
एक दिन पान सिंह तोमर के रिश्तेदार बलवंत सिंह उनके बेटों और उनके परिवार पर जब हमला कर देता है और बंदूक लकड़ी साइड वाले हिस्से से उसके लड़के के मुंह पर मार देता है जिससे उनका जबड़ा टूट जाता है और पान सिंह तोमर पुलिस प्रशासन से मदद लेते हैं उल्टा उन्हीं को समझा कर रिश्वतखोरी कर कर पुलिस प्रशासन कोई मदद नहीं करता है जैसा की फिल्म में भी दिखाया गया है जब भंवर सिंह उनकी मां को मार देता है तब उनकी मां बोलती है कि बेटा बदला जरूर लेना ऐसा माना जाता है कि बीहड़ में जितना भी एरिया चंबल के अंतर्गत आता है वहां के लोग हथियार रखना उनका पुराना शौक था पवन सिंह की कहानी में यहां पर मोड़ आता है जब पुलिस प्रशासन उनकी मदद नहीं करता है तब मजबूरन चंबल का रुख करना पड़ता है और यही था टर्निंग प्वाइंट पान सिंह तोमर ने अपने हाथों में हथियार उठा लिया भारत का एक सैनिक एक नेशनल चैंपियन बागी यानी की डाकू बन गया
- पान सिंह तोमर ने लिया अपना बदला
जब पान सिंह चंबल के जंगलों में पहुंचे इसे पहले और भी गैंग वहां पर सक्रिय हुआ करते थे फेमस गैंग था मानसिंह का कौन ही नहीं जानता होगा मान सिंह का नाम और फूलन देवी , मोहन सिंह नामी गैंग सकरी हुआ करते थे चंबल में ऐसे में पान सिंह तोमर ने अपने गैंग की अलग स्थापना की कुछ उनके जो रिश्तेदार और उनके जो चाहने वाले उनके जो मित्र थे उनको गैंग में शामिल किया उन्होंने कसम खाई थी जब तक अपने चाचा बलवंत सिंह और उनके लड़कों को ठिकाने न लगा दूं तब तक ही हथियार नहीं रखूंगा कुछ दिन बाद उन्होंने अपने चाचा और उनके लड़कों को उन्हीं के गांव में गोली मारकर उनकी हत्या कर दी फिर वह दलदल में फंसते चले गए यह ऐसा रास्ता था यहां पर आदमी जा तो सकता था लेकिन लौट नहीं सकता था फिल्म पुलिस प्रशासन भी सख्त हो गया
- डाकू को डाकू कहाँ पर क्यों चढ़ते थे डाकू
पान सिंह तोमर का मानना था कि हम डाकू नहीं हैं हम बागी हैं अगर किसी भी डाकू पर अगर आप डाकू का देते तो वह गुस्सा हो जाता था यह रूल था चंबल का पुलिस प्रशासन समाज का सताया हुआ व्यक्ति डाकू नहीं बल्कि बागी होता था एक कहावत
बीहड़ में बागी होते हैं डाकू नहीं
डकैत पैसे के लिए लड़ता है बागी अपनी इज्जत के लिए
बागी के करियर में कभी भी किसी गरीब असहाय मजलूम को नहीं सताया उल्टा अपने गांव की मदद ही करते थे गरीब असहाय की सेवा ही करते थे ऐसे में उनका ऐसा इमेज बन गया था कि कोई मुखबीरि ( उनका पता बताना )भी नहीं करता था पान सिंह तोमर कभी इस गांव कभी उसे गांव में रहा करते थे
- कैसे हुआ पान सिंह तोमर का एनकाउंटर
पान सिंह तोमर एक पत्रकार को अपना इंटरव्यू दे देते हैं जो उन्होंने साथ गुजर मारे थे उन्होंने कहा था कि वह मैं नहीं मारे उन्होंने मेरे साथ गलत किया तो मुझे मजबूरन मारना पड़ा जैसा की पान सिंह तोमर फिल्म में एक डायलॉग आता है की बाकी पान सिंह तोमर हत्यारा नहीं है वह जब खबर प्रकाशित हुई तब पुलिस प्रशासन के पैरों तले जमीन सरक गई उन दिनों मुरैना के कलेक्टर ने आदेश दिया₹10000 का इनाम पान सिंह पर रखा गया हालांकि वह डाकू बन गए थे तो कुछ बुरे काम भी करने लगे थे वह एक पकड़ लेकर एक गांव में रुकने वाले थे पकड़ का मतलब किसी व्यक्ति को किडनैप कर कर उसे गांव में रखने वाले थे और जिस गांव में रखने वाले थे उसी गांव का बांदा उनके गिरोह में काम करता था उसकी ससुराल उसी गांव में थी बात 1 अक्टूबर 1981 की है जब उसे गांव में उन लोगों ने डेरा डाला उन्हीं के ग्रहों के इस व्यक्ति ने उनका पता पुलिस को दे दिया था पुलिस ने घेराबंदी उसे गांव की कर दी एक डाकू पर 10 पुलिस वाले लगाए गए पुरा गांव छावनी में तब्दील हो गया उसे गांव का नाम रठीनपुरा था जिला मुरैना मध्य प्रदेश गहरा बंदी लगभग शाम के 4:00 बजे की गई दोनों तरफ से गोलीबारी हुई काफी देर तक मुठभेड़ चलती रहे लगभग 8:00 बजे उसी गांव के नाले के पास में पान सिंह तोमर को गोली मार दी गई एक खिलाड़ी एक सेवा के जवान की जिंदगी के वह आखिरी पल थे और उनका आखिरी समय ऐसे उनका एनकाउंटर हुआ
यही है वह गांव जहां पुलिस ने घेरा बंदी की थी
इसी पेड़ के नीचे मारा था पान सिंह तोमर को
- जब मैं 2025 में उसे गांव पहुंचा
जब हम और हमारी टीम उसे गांव पहुंची इस बारे में जानकारी लेने के लिए तो वहां के लोगों ने वह जानकारी देने से मना कर दी क्योंकि उसे गांव को आज भी लोग गद्दार कहते हैं क्योंकि पान सिंह तोमर की जो छवि थी एक अच्छी छवि थी उनको कभी डाकू के रूप में लोगों ने देखा ही नहीं जब हम उसे गांव में पहुंचे तब हम लोगों से उल्टा वह लोग सवाल करने लगे मैंने देखा वहां पर आज भी पुलिस चौकी मौजूद है पुरानी पुलिस चौकी जर्जर हालत में है और एक नई चौकी का निर्माण कर दिया गया है
पुरानी पुलिस चौकी
नई पुलिस चौकी
देश के सिस्टम ने एक नेशनल चैंपियन को डाकू बना दिया
